Rahat indori shayari in hindi

बढ़ गयी है के घट गयी दुनिया

बढ़ गयी है के घट गयी दुनिया
मेरे नक़्शे से कट गयी दुनिया

तितलियों में समा गया मंज़र
मुट्ठियों में सिमट गयी दुनिया

अपने रस्ते बनाये खुद मैंने
मेरे रस्ते से हट गयी दुनिया

एक नागन का ज़हर है मुझमे
मुझको डस कर पलट गयी दुनिया

कितने खानों में बंट गए हम तुम
कितनी हिस्सों में बंट गयी दुनिया

जब भी दुनिया को छोड़ना चाहा
मुझसे आकर लिपट गयी दुनिया

राहत इन्दौरी

एक दिन देखकर उदास बहुत

एक दिन देखकर उदास बहुत
आ गए थे वो मेरे पास बहुत

ख़ुद से मैं कुछ दिनों से मिल न सका
लोग रहते हैं आस-पास बहुत

अब गिरेबाँ बा-दस्त हो जाओ
कर चुके उनसे इल्तेमास बहुत

किसने लिक्खा था शहर का नोहा
लोग पढ़कर हुए उदास बहुत

अब कहाँ हम-से पीने वाले रहे
एक टेबल पे इक गिलास बहुत

तेरे इक ग़म ने रेज़ा-रेज़ा किया
वर्ना हम भी थे ग़म-श्नास बहुत

कौन छाने लुगात का दरिया
आप का एक इक्तेबास बहुत

ज़ख़्म की ओढ़नी, लहू की कमीज़
तन सलामत रहे लिबास बहुत

राहत इन्दौरी

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