Rahat indori shayari in hindi

अब ना मैं वो हूँ, ना बाकी हैं ज़माने मेरे

अब ना मैं वो हूँ, ना बाकी हैं ज़माने मेरे
फिर भी मशहूर हैं, शहरों में फ़साने मेरे

जिंदगी हैं तो नए जख्म भी लग जायेंगे
अब भी बाकी हैं कई दोस्त पुराने मेरे

आप से रोज़ मुलाक़ात की उम्मीद नहीं
अब कहा शहर में रहते हैं ठिकाने मेरे

उमरा के राम ने, साँसों का धनुष तोड़ दिया
मुझ पे एहसान किया आज खुदा ने मेरे

आज जब सो के उठा हूँ तो ये महसूस किया
सिसकियाँ भरता रहा कोई सिरहाने मेरे

राहत इन्दौरी

जो दे रहे हैं फल तुम्हे पके पकाए हुए

जो दे रहे हैं फल तुम्हे पके पकाए हुए
वोह पेड़ मिले हैं तुम्हे लगे लगाये हुए

ज़मीर इनके बड़े दागदार है
ये फिर रहे है जो चेहरे धुले धुलाए हुए

जमीन ओढ़ के सोये हैं दुनिया में
न जाने कितने सिकंदर थके थकाए हुए

यह क्या जरूरी है की गज़ले ख़ुद लिखी जाए
खरीद लायेंगे कपड़े सिले सिलाये हुए।
हमारे मुल्क में खादी की बरकते हैं मियां

चुने चुनाए हुए हैं सारे छटे छटाये हुए

राहत इंदौरी

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