Rahat indori shayari in hindi

इसे सामान-ए-सफर जान ये जुगनू रख ले

इसे सामान-ए-सफर जान ये जुगनू रख ले
राह में तीरगी होगी मीरे आँसू रख ले

तु जो चाहे तो तिरा झूट भी बिक सकता है
शर्त इतनी है कि सोने की तराजू रख ले

वो कोई जिस्म नहीं है की उसे छू भी सकें
हाँ अगर नाम ही रखना है तो खुश्बू रख ले

तुझ को अन-देखी बुलंदी में सफर करना है
एहतियातन मिरी हिम्मत मीरे बाजू रख ले

मिरी ख्वाहिश है की आँगन में न दीवार उठे
मिरे भाई मिरे हिस्से की जमीं तू रख ले

राहत इंदौरी

उसे अब के वफाओं से गुजर जाने की जल्दी थी

उसे अब के वफाओं से गुजर जाने की जल्दी थी
मगर इस बार मुझ को अपने घर जाने की जल्दी थी

इरादा था कि मैं कुछ देर तूफाँ का मज़ा लेता
मगर बेचारे दरिया को उतर जाने की जल्दी थी

मैं अपनी मुट्ठियों मैं क़ैद कर लेता ज़मीनों को
मगर मेरे क़बीले को बिखर जाने की जल्दी थी

मैं आखिर कौनसा मौसम तुम्हारे नाम कर देता
यहाँ हर एक मौसम को गुजर जाने की जल्दी थी

वो शाखों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे
बड़े जिंदा-नज़र थे जिन को मर जाने की जल्दी थी

मैं साबित किस तरह करता कि हर आईना झूटा है
कई कम-ज़र्फ़ चेहरों को उतर जाने की जल्दी थी

कम-ज़र्फ़ = नीच, मुर्ख, कंजूस,

राहत इंदौरी

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