Rahat indori shayari in hindi

घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है

घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है
अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना है

जिस्म से साथ निभाने की मत उम्मीद रखो
इस मुसाफिर को तो रास्ते में ठहर जाना है

मौत लम्हे की सदा ज़िंदगी उम्रों की पुकार
मैं यही सोच के ज़िंदा हूँ की मर जाना है

नश्शा ऐसा था की मय-खाने को दुनिया समझा
होश आया तो ख़याल आया की घर जाना है

मेरे जज़्बे की बड़ी कद्र हैं लोगों में मगर
मेरे ज़ज्बें को मेरे साथ ही मर जाना है

राहत इंदौरी

चमकते लफ्ज़ सितारों से छीन लाए हैं

चमकते लफ्ज़ सितारों से छीन लाए हैं
हम आसमाँ से ग़ज़ल की ज़मीन लाए हैं

वो और होंगे जो खंजर छुपा के लाते हैं
हम अपने साथ फटी आस्तीन लाए हैं

हमारी बात की गहराई ख़ाक समझेंगे
जो पर्बतों के लिए खुर्दबीन लाए हैं

हँसो न हम पे कि हर बद-नसीब बंजारे
सरों पे रख के वतन की ज़मीन लाए हैं

मेरे क़बीले के बच्चों के खेल भी हैं अजीब
किसी सिपाही की तलवार छीन लाए हैं

खुर्दबीन = दूरबीन

राहत इंदौरी

जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से
जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से
फूल इस बार खिले हैं बड़ी तय्यारी से

अपनी हर साँस को नीलाम किया है मैं ने
लोग आसान हुए हैं बड़ी दुश्वारी से

जेहन में जब भी तेरे ख़त की इबारत चमकी
एक खुश्बू सी निकलने लगी अलमारी से

शाहज़ादे से मुलाक़ात तो ना-मुमकिन है
चलिए मिल आते है चल कर किसी दरबारी से

बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए
हम ने खैरात भी माँगी है तो खुद्धारी से

राहत इंदौरी

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